Sweet Memories

              श्री दयाराम वैष्णव से सम्पूर्ण वैष्णव समाज भली भांति परिचत है आप जोधपुर से प्रकाशित होने वाली वैष्णव सन्देष के संस्थापक, संचालक एवं प्रधान सम्पादक जब तक जीवित थे तब तक रहे । श्री दयाराम जी का जन्म दिनांक 6 अक्टूबर 1933 शरद पूर्णिमा को जोधपुर में जालप बावड़ी स्थित गोपाल जी के मन्दिर में श्री लादुराम जी एवं श्रीमती मीमा देवी वैष्णव के घर हुआ  । वे बचपन से ही होनहार, कुछ कर गुजरने की तमन्ना रखते थे । वे भीड़ का हिस्सा न रहकर उससे अलग रहने की हमेषा कोषिष करते थे और इस प्रकार उन्होंने एक सफल और कामयाबी से परिपूर्ण मुकाम हासिल किया । 
              उन्होंने अपनी उम्र से हमेषा आगे रहकर कार्य किया वे हर पल गृहकार्य के साथ-साथ समाज के कार्यों में भी आगे रहते थे समाज के हर कार्य को करने की ललक उनमें हरदम रहती थी । जीवन के 18 वें बसन्त में इनका विवाह आयुष्मती हंसादेवी के साथ सम्पन्न हुआ उन्हें 6 पुत्रियां व एक पुत्र रत्न प्राप्त हुआ । घर परिवार में ‘‘बाबू जी‘‘ के नाम से पुकारे जाते थे उन्होंने अध्ययन के साथ-साथ उत्तर रेल्वे में नौकरी की । 1951 में ‘‘ वैष्णव सन्देश ‘‘ त्रैमासिक पत्रिका का प्रकाषन आरम्भ किया । बाद में 1953 में इसे मासिक कर दिया जो 2008 तक समाजोत्थान में प्रासंगिक भूमिका निभाता रहा तथा सबसे ज्यादा लोकप्रिय सामाजिक पत्रिका के रूप में पहचाना जाता रहा, उन्होंने इसके साथ-साथ प्रिटिंग का कार्य ‘‘विष्णु प्रिटिंग प्रेस‘‘ के नाम से भी किया । 

             सन् 1954 में अखिल भारतीय वैष्णव ब्राह्मण समाज के राष्ट्रीय उप मन्त्री चुने गये राजस्थान में अजमेर, उदयपुर, ब्यावर एवं जोधपुर में समाज के सफल अधिवेषनों को सम्पन्न करवाने में आपने अपनी प्रतिभा का परिचय दिया । राजस्थान के बाहर भावनगर, हरिद्वार, अहमदाबाद, बड़ौदा, भोपाल, दिल्ली, अलीगढ़ के सामाजिक सम्मेलनों में सक्रिय भूमिका से सभी को प्रभावित किया उन्होंने सामाजिक परिपे्रक्ष्य में अपना विषिष्ठ स्थान बना लिया था । ये अखिल भारतीय ब्राह्मण सेवा संघ बम्बई के उपाध्यक्ष, श्री वैष्णव ब्राह्मण समाज, जोधपुर के प्रचार मन्त्री व उपाध्यक्ष भी रहे उन्होंने कई सामाजिक पुस्तकों एवं स्मारिकाओं का प्रकाषन किया । इनकी बहुमुखी प्रतिभा से प्रभावित होकर श्री राजस्थान सन्तोष मण्डल, बैंगलोर की ओर से ‘‘श्री सन्तोष सम्मान पुरस्कार‘‘ जगद्गुरू श्री रामान्दाचार्य की पावन जयन्ती 14 जनवरी 2004 के शुभ दिन दिये जाने की घोषणा 4 जून 2003 को की गई थी । 

            श्री दयाराम जी एक व्यक्ति न होकर स्वयं में एक संस्था थे जोधपुर वैष्णव ब्राह्मण समाज में भी इनका योगदान महत्वपूर्ण था । दिनांक 22 दिसम्बर 1991 को वैष्णव समाज जोधपुर ने उनको अभिनन्दन पत्र देकर सम्मानित किया । दिनांक 6 नवम्बर 2003 को इनकी देह पंचतत्व में विलीन हो गई । 

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